स्‍वामी रामकृष्‍णानंद द्वारा उद्गार



1. "मत सोचो तुम विशेष हो, अनुभव करो कि तुम अद्वितीय हो"।

 

2. "जो मरना चाहता है केवल वही प्रेम करने के योग्‍य है..."

 

3. "एक प्रामाणिक धार्मिक व्‍यक्ति वह नहीं है जिसने ईश्‍वर को ढूँढ लिया,

अपितु जिसने खोज करना कभी भी नहीं छोडा..."

 

6. "जो आपको आघात पहुँचाता है उस पर क्रोध न करें...

संभव है यही वह समय है जब उसे आपकी सर्वाधिक आवश्‍यकता है..."

 

7. "इस बात की अनुभूति कर लेना कि आप केवल वही हो सकते हैं....

जो आप हैं वही होना... प्रबोधन है" ।

 

8. "स्‍वयं की विद्यमानता केवल विचार नहीं कि आप हैं...अपितु आपका होना..." ।

 

9. "मैं हमारी सुगन्‍ध से संसार को बदलने का मिथ्‍याप्रयास नहीं करता...

अपितु इसे संभवतঃ अधिक सुगंधित बनाने का..."

 

10. "पश्चिम में, जहॉं श्रेष्ठत्व के उपनिवेशवादी तत्व एवं निराधार जातीय भावनाऍं अब

भी प्रचलित हैं सामान्यतः कोई भी धर्म जिसका पालन किया जाता हो तथा उसका उद्गम

बाइबल से संबंधित नहो, उसका वर्गीकरणक्षणेन्मादया संप्रदाय के रूप में किया जाएगा ।" ‍‍‍‍‍

 

11. "मेरी विवेकबुध्दि के अनुसार, हिन्‍दुत्‍व ईश्‍वर के अस्तित्‍व के प्रति विश्‍वास का नहीं,

अपितु उस पूर्णत्‍व से पृथक हमारी विद्यमानता के प्रति संदेह का धर्मोपदेश देता है..."

 

16. "जब आप अपना जीवन स्‍वयं के अनुसार जीना त्‍याग देंगे, केवल तभी जीवन आपके

मध्‍य से अपने अनुसार जी सकता है"

 

18. "मैं धर्म से प्रेम करता हूँ, एवं उसी कारण से मैंने स्‍वयं को धर्म से अलिप्‍त रखा...”

  

19. "जीवन में आनेवाली परिस्थितियॉं तुम्‍हें जो प्रसन्‍नता देती हैं उनके साथ उसके

अनुरूप न्‍याय मत करो...अपितु उसके अनुरूप, जो वे तुम्‍हें सिखाती हैं...."

 

20. "आप वही सब हैं जिसकी आपको आवश्‍यकता है"

 

 

25. "प्रामाणिक धर्म केवल और अधिक प्रभावशाली मंदिरों के निर्माण का प्रयास ही नहीं,

अपितु उस पर विश्‍वास करनेवालों की जीवात्‍माओं का संवर्धन करने का प्रयास करता हैঃ

केवल समुदाय के विस्‍तार के लिये ही नहीं अपितु उनके ह्दयों को विस्‍तीर्ण बनाने के लिये..."

 

 

26. "अपनी अनभिज्ञता और सीमाबध्‍दता के विषय में बोलनेवाले बहुत&से महान मुनिजनों से

तथा मुझे अपनी कल्‍पनाओं एवं निष्‍कर्षों का विश्‍वास दिलाने का प्रयास करनेवाले बहुत&से

मूर्खों से भी मैं अपने जीवन में मिला..."

 

27. " जब तक आप स्‍वयं को अपने कर्मों का प्रवर्तक समझेंगे आप सच्‍चे धर्मात्‍मा नहीं बन सकते...”

 

30. "मैं नया होने के लिये नहीं, मैं मानवता को कुछ नया दूँ ये मेरा उद्देश्य नहीं है,

अपितु जो सदैव से है एवं सदैव के लिये है, उसके लिये चेतना का विकास करने एवं जागृति

लाने का निमंत्रण सभी को देने के लिये आया हूँ, जोव्यक्ति के अंतस्थ की गहराई में..."‍ ‍‍

 

31. "मैं नया होने के लिये नहीं, मैं मानवता को कुछ नया दूँ ये मेरा उद्देश्य नहीं है,

अपितु जो सदैव से है एवं सदैव के लिये है, उसके लिये चेतना का विकास करने एवं

जागृति लाने का निमंत्रण सभी को देने के लिये आया हूँ, जोव्यक्ति के अंतस्थ की गहराई में..."
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32. "प्रसन्‍नता या पीडा कोई पर्याप्‍त कारण नहीं है जिस पर निर्णय आधारित किया जा सके..."

 

 

33. "यदि हम इस संसार में रिक्‍तहस्‍त आये हैं तो...क्‍या आप नहीं सोचते कि हम

भौतिक संपत्ति को अतिरिक्‍त महत्‍व दे रहे हैं "

 

 

34. "आप केवल वही हैं...आप जिसे ढूँढ रहे थे..."