परम पूज्य श्रील बी.ए. परमद्वैति महाराज

वीडियो देखने के लिए यहां दबाइए

 

 

परम पूज्य श्रील बी.ए. परमद्वैति महाराज, जिन्हें उनके शिष्य गुरु महाराज के नाम से भी बुलाते हैं, का जन्म 12 अक्टूबर, 1953 को जर्मनी में हुआ था। छोटी उम्र में ही मानव के साथ होते अन्याय ने उनके अंतर्मन में एक बेचैनी को जन्म दिया। सत्रह वर्ष की आयु में ही वेदों के अध्ययन के साथ-साथ योग में पारदर्शिता ढूंढ़ने लगे और अपने जीवन को सन्यास मार्ग के कट्टर नियमों के अनुपालन में समर्पित कर दिया।

आप इस्कॉन (इंटरनैशनल सोसयटी फॉर कृष्णा कॉन्शियस्नेस) के संस्थापक परमपूज्य ए.सि. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के शिष्य हैं। 1972 में पेरिस में श्रील प्रभुपाद से 'अलहनाथ दास ब्रह्मचारी' के नाम से दीक्षा मंत्र लेने के बाद आपने चैतन्य महाप्रभु के संदेश को समग्र युरोप एवं अमरीका में प्रचलित करने में अपने गुरु की सेवा की। चौबीस वर्ष की आयु में आपने सन्यास ग्रहण किया। आपका दीक्षा का नाम भक्ति आलोक परमद्वैति महाराज है। कई केंद्रों की स्थापना एवं वेद के परात्पर संदेश के प्रचार में गुरु महाराज का जीवन काफी सक्रिय रहा है। आप चैतन्य महाप्रभु की कुल परंपरा में ब्रह्म गौड़िय संप्रदाय के शिष्य अनुक्रम की बारहवीं पीढ़ी के गुरु के रूप में प्रकट हुए।

परम पूज्य बी.ए. परमद्वैति महाराज रामकृष्णानंद स्वामी के आध्यात्मिक गुरु हैं। गुरु महाराज अमरीका में उच्च वैदिक शिक्षा केंद्र और भारत में वृन्दा केंद्र के संस्थापक हैं जिनके केंद्र समग्र विश्व में हैं। आप विश्व विस्तृत वैष्णव संस्था के सहसंस्थापक हैं जो विश्व भर में फैले हुए आध्यात्मिक परिवारों के आपसी संपर्क के केंद्र डोर है। आपने बहुत सारी किताबों का लेखनकार्य किया है, जैसे कोलम्बिया के प्रथम आध्यात्मिक गुरु (The first spiritual masters in Columbia), आज़ाद नारी (The free woman), भगवद् गीता - सर्वोच्च विज्ञान (Bhagvad Gita - The Supreme science), योग पाठ्यक्रम (Yoga courses), वैष्णव-धर्म के इतिहास पर पुस्तकें (Books about the history of Vaishnavism), दीक्षा - द्वितीय जन्म (Initiation - the second diksha), पारिस्थितिकि एवं ध्यान (Ecology and meditation)* आपने वर्तमानकालीन विश्व की समस्या एवं प्रसंग पर कई लेख एवं पत्रक लिखी हैं। आपने भक्तियोग के गुप्त विज्ञान (Confidential science of Bhaktiyoga), योगी के रहस्य (The secrets of a yogi), रहस्यमय भारत (The mysterious India) एवं कई अन्य किताबों का संपादन भी किया है। आप जर्मनी, अंग्रेज़ी एवं स्पेनिश भाषा में कई वेबसाइट चला रहे हैं।

श्रील गुरु महाराज विभिन्न प्रकार के कार्यों में जुड़े हुए हैं जिनमें आप निरंतर एक प्रवक्ता हैं एवं सांप्रदायिक जीवन पद्धति के अविरल सलाहकार भी हैं जो पारिस्थितिक एवं आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित है। एक मठवासी और सौ से अधिक योग केंद्रों के संस्थापक होने के अलावा आप एक कलाकार एवं 'हारमोनी स्कूल ऑफ कॉन्शियस आर्टस' के संस्थापक हैं। आपने कई कलात्मक वृत्तचित्रों के निर्माण में भाग लिया, कई संगीत एवं नाट्य रचनाओं का लेखन एवं निर्देशन किया, कई गूढ़ सांकेतिक अर्थ एवं पारिस्थितिकि कला की परियोजनाओं का डिज़ाइन एवं निर्माण किया, जैसे कि पेरु देश के लीमा शहर का इको ट्रूली आश्रम नभोमंडल। गुरु महाराज प्रथम पश्चिमी सन्यासी हैं जिन्होंने भारत में केंद्रों की स्थापना की जहां उन्होंने वैष्णव वास्तुकला के सुंदर रत्नों का प्रतिष्ठापन करने की परियोजना बनाई। इनमें प्रसिद्ध है वृन्दकन्या जो स्पेनिश भाषी तीर्थयात्रियों के सत्कार का मरुधाम बना और खासतौर से वैष्णव विद्यालय को अपने उन विद्यार्थियों और अनुयायियों की सेवा में लगाया जो अमरीकी महाद्वीप से आते हैं। आजकल आप समग्र युरोप एवं अमरीका की यात्रा करते हुए अंग्रेज़ी, जर्मनी, स्पेनिश एवं पुर्तगाली भाषाओं में भाषण दे रहे हैं, आध्यात्मिक साहित्य का वितरण और उसकी गूढ़ व्याख्या में तल्लीन हैं, साथ ही शिष्यों को स्वीकार करने का पुण्य कार्य भी कर रहे हैं। उनकी गहन अनुभूति से कई साधकों को योगमार्ग में प्रवीण होने में मदद मिली। उनका काम फैलता जा रहा है जिसका प्रधान कारण है मानव जाति के प्रति उनका प्रेमभाव एवं अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति उनका सेवाभाव। आप शाकाहारी समाज एवं हर देश में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों को प्रेरणा देते हैं। आपके शिष्य, अनुयायी एवं मित्रों की संख्या हज़ारों में है और वे सभी आपके लक्ष्य में तत्पर हैं। आप वैष्णव धर्म की ऐसी भक्तिपूर्ण प्रस्तुति करते हैं कि कई लोगों के साथ आपने स्नेहपूर्ण संबंध बनाए हैं जिनमें भारत के कई राजा और राजनीति, कला एवं धार्मिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोग शामिल हैं। सबसे विरल बात यह है कि आपने इतनी सारी मान्यता पाकर भी अपनी नम्रता, पवित्रता, विद्वत्ता, सादगी एवं दूसरों की मदद आदि गुणों में कमी नहीं होने दी।