परमपूजà¥à¤¯
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द
इनका जनà¥à¤® पालघाट जिले
के माथà¥à¤° गांव में सनॠ1924
में हà¥à¤† और माता-पिता ने घर
में इनका नाम शेखरनॠरखा।
आप 27 नवंबर सनॠ1954 को सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
शिवानंद के आशà¥à¤°à¤® आठऔर
अगले साल ही बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤¾à¤°à¥€ के
रूप में दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤à¥¤ सनà¥
1958 के महाशिवरातà¥à¤°à¤¿ के
पà¥à¤£à¥à¤¯ दिवस में आपने
सनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ गà¥à¤°à¤¹à¤£ किया और आपको
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द का नाम
दिया गया। योग के सà¤à¥€
पकà¥à¤·à¥‹à¤‚ में अधिकारी होने
पर à¤à¥€ इनकी विशेष रà¥à¤šà¤¿
हठयोग में थी जिसे
इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने बहà¥à¤¤ लगन से
सीखकर उसमें निपà¥à¤£à¤¤à¤¾
पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की। जब सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
विषà¥à¤£à¥ देवानंद गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ
की आजà¥à¤žà¤¾ हेतॠपशà¥à¤šà¤¿à¤® गà¤,
तब आप आशà¥à¤°à¤® में हठयोग के
शिकà¥à¤·à¤• बन गà¤à¥¤ आप पाक कला
में à¤à¥€ पà¥à¤°à¤µà¥€à¤£ थे जिसकी
वजह से शà¥à¤°à¥€ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ ने
सनॠ1959 में सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
गोविंदानंद की
सेवानिवृतà¥à¤¤à¤¿ के बाद आपको
अपनी सेवा के लिठनियà¥à¤•à¥à¤¤
किया। इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने सचà¥à¤šà¥‡ मन
से गà¥à¤°à¥ की सेवा की और इतने
विशà¥à¤µà¤¸à¤¨à¥€à¤¯ थे कि गà¥à¤°à¥ ने
अपने अंतिम दिनों में इनको
अपने पास सेवा करने के लिà¤
रख लिया। कà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¤¾ में
गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ की सेवा करने के
कारण और उसी नाम के अनà¥à¤¯
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से अलग पहचानने
के लिठलोग शनैः शनैः आपको
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£ (कà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¤¾) के
नाम से संबोधित करने लगे।
सनॠ1996 में ऋषिकेश में
परमपूजà¥à¤¯ ने सà¥à¤µà¤¯à¤‚ ही
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ रामकृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द को
हठयोग और सनातन धरà¥à¤® की
शिकà¥à¤·à¤¾ दी।
शà¥à¤°à¥€à¤²à¤¾ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ के
अंतरà¥à¤®à¤¨ में पà¥à¤°à¥‡à¤® à¤à¤µà¤‚
कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾ की अमिट छाप
छोड़कर 20 सितंबर सनॠ1999 को
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द अपनी
देह को तà¥à¤¯à¤¾à¤— करके
महासमाधि में पहà¥à¤‚च गà¤à¥¤