Bhaktivedanta Ramakrishnananda Swami
श्रील गुरुदेव का वर्णन

 

वन्दे श्रीरामकृष्णानन्दस्य पादारविन्दे

कारुण्याब्धोर्गुरोर्मे तत्त्वप्रबोधप्रदीप्तेः।

मैं अपने गुरूदेव श्री रामकृष्णानन् के चरणकमलों का वंदन करता हूँ,

जो करूणा कासागर एवं सत्&ज्ञान के प्रबोधक हैं

दिव्यप्रेम्णः सुधाश्रोताम्मःप्रमग्नः सदैव

भक्तेभ्योऽसौ ददाति श्रीदेवदेवानुरागम्॥

वे सदैव ईश्वरीय प्रेम की मधुमय जलधारा में डूबे रहते हैं

एवं भक्तों को देवों के देव के प्रति प्रेम सिखाते हैं।

 

 

 

स्वामी रामकृष्णानंद जिन्हें इनके भक्तजन श्रद्धा एवं स्नेह से 'श्रीला गुरुदेव' कहकर संबोधित करते हैं, एक सन्यासी हैं जिन्होंने हिंदू धर्म के सन्यास मार्ग को स्वेच्छा से अपनाया है। स्वामी रामकृष्णानंद एक योगी, रहस्यवादी, दार्शनिक, धर्मगुरु एवं निःसंदेह एक दिव्य पुरुष हैं। उनका जन्म २१ मार्च, १९५८ को चिली गणतंत्र की राजधानी, सेन्टिएगो में हुआ था।

 

उनके जन्म का इतिहास एक आत्मा के विकास एवं उत्थान का इतिहास है जिसका एकमात्र लक्ष्य एवं अभिरुचि ईश्वर एवं सत्य की खोज है। आठ साल की कच्ची आयु में उन्हें एक साहजिक और गहन आध्यात्मिक अनुभूति हुई जिसके उपरांत ईश्वर और सत्य की गहरी खोज में आपने अपना जीवन समर्पित कर दिया। फिर से उस 'अनुभव' की गहन अभिलाषा उन्हें दूर सुदूर ले गई, भिन्न-भिन्न स्थानों, देशों और राष्ट्रों में भ्रमण करते हुए, दक्षिण अमेरिका की उनकी संस्कृति से दूर। अपनी इस आत्मखोज के दर्मियान आप अनेक परंपराओं, धर्मों एवं आध्यात्मिक पद्धतियों के महान भक्तों, संतों, ऋषियों और गुरुजनों के संपर्क में आए।

 

विभिन्न दर्शनों एवं धर्मों के अध्ययन से आपको अपने अंतर की गहराई में हिंदू धर्म अथवा सनातन धर्म के प्रति अवर्णनीय श्रद्धा एवं प्रेम के संबंध का अहसास हुआ जो पूर्व जन्मों के संस्कार का फल था।

 

एक स्थापित धर्म के रूप में आपका प्रथम समागम वैष्णव धर्म के साथ सन् १९७७ में बंगाली गौड़िय प्रणाली के श्री चैतन्य महाप्रभु के प्यून्टे एल्टो चिली के मंदिर में हुआ। यहीं पर आपने परमपूज्य श्री श्रीमद अतुलानंद आचार्य की छत्रछाया में भक्तियोग का अध्ययन प्रारंभ किया, जिसे बाद में परमपूज्य श्री श्रीमद भक्ति आलोक परमद्वैति स्वामी महाराज के साथ जारी रखा, जिन्होंने स्वयं आपको 'भक्ति शास्त्री' एवं 'त्रिदण्डी भिक्षु' की उपाधि प्रदान की। भक्तियोग के ये दोनों अभूतपूर्व गुरु 'वृन्दा'संस्थान के संस्थापक हैं और परमपूज्य ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के प्रत्यक्ष शिष्य हैं।

 

परमपूज्य श्री स्वामी शिवानंद सरस्वती के प्रत्यक्ष शिष्य परमपूज्य श्री श्रीमद स्वामी विष्णु देवानंद ने आपको 'रामकृष्ण' के नाम से दीक्षा मंत्र प्रदान किया। पूर्ण योग के विविध पहलुओं के एकीकरण के प्रारंभिक अध्ययन में यही आपके मार्गदर्शक एवं प्रेरणा स्रोत रहे। उस प्रथम दीक्षा से ही उस महामंत्र ने स्वामी रामकृष्णानंद का कभी साथ नहीं छोड़ा।

 

सन् १९८८ में स्वामी विष्णु देवानंद ने अपने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री स्वामी शिवानंद के द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक सत्ता के आधार पर स्वामी रामकृष्णानंद की पंडिताई, श्री श्री राधा-कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति एवं भक्तियोग में उनकी प्रज्ञा एवं ज्ञान को पहचानकर 'कृष्ण भक्त' की विशेष उपाधि से सम्मानित किया। ऐसा पहली और आखिरी बार ही हुआ कि स्वामी विष्णु देवानंद ने किसी को भक्तियोग की विद्वत्ता के लिए यह अमूल्य उपाधि प्रदान की।

 

स्वामी रामकृष्णानंद हिंदू धर्म, वैदिक धर्म एवं यौगिक दर्शनशास्त्र का अध्ययन गहराई से करते रहे एवं उस समय के कई प्रख्यात योगियों एवं गुरुओं से उन्होंने प्रशिक्षण, मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त किया। उनमें हैं परमपूज्य श्री श्री स्वामी विदितात्मानंद, परमपूज्य श्री श्री स्वामी सच्चिदानंद, परमपूज्य श्री श्री स्वामी ज्योर्तिमयानंद, परमपूज्य श्री श्री स्वामी ब्रह्मानंद, परमपूज्य स्वामी कृष्णानंद, परमपूज्य स्वामी दयानंद सरस्वती, परमपूज्य ब्रह्मानंद सरस्वती एवं कई अन्य जिनसे उन्हें प्रशिक्षक, मार्गदर्शक एवं शिक्षक की उपाधि पत्र एवं प्रमाण पत्र प्राप्त हुए। उन्हें 'आनंद आश्रम' के स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से 'योग शिक्षक' का प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। अंत में आप 'योग आचार्य' की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित किए गए जो कनाडा में शिवानंद आश्रम में योग वेदांत के शिवानंद केंद्र के संस्थापक स्वामी विष्णु देवानंद ने स्वयं सन् १९८९ में प्रदान किया। कई सालों के बाद उन्हें भारत के मैसूर राज्य के प्रतिष्ठित 'श्री शंकरानंद योग आश्रम' से 'योग आचार्य' की उपाधि एवं 'श्री विवेकानंद योग प्रतिष्ठान' से 'योग प्रवीण' की उपाधि प्राप्त हुई।

 

सन् १९९० में 'द योग रिसर्च फ़ाउंडेशन'के संस्थापक, स्वामी ज्योर्तिमयानंद ने उन्हें 'योग रत्न' की उपाधि प्रदान की।

सन् १९९१ में अगस्त महीने में आपको कीर्तनानंद स्वामी द्वारा सनातन धर्म के अंतर्गत ब्राह्मण होने का आदेश एवं पुनीत जनेऊ की दीक्षा दी गई।

 

आप 'डिवाइन लाइफ सोसायटी' के परमपूज्य स्वामी कृष्णानंद से भारत में मिले जो स्वामी शिवानंद के शिष्य थे और जिनके साथ आपको हठयोग के ज्ञान को विस्तार से समझने का बहुमूल्य अवसर मिला।

 

सन् १९९५ में परमपूज्य श्री श्री स्वामी ज्योर्तिमयानंद सरस्वती ने आपसे पावन वैदिक मंत्रों से शिष्यों को दीक्षा देने का अनुरोध किया और सरस्वती आदेश के अंतर्गत स्वामी रामकृष्णानंद के नाम से सन्यास मार्ग का अनुदान दिया। स्वामी ज्योर्तिमयानंद ने खुद कुछ साधकों से सिफारिश की कि वे स्वामी रामकृष्णानंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मान लें।

 

उसी वर्ष में आपकी मुलाकात महान सिद्ध संत परमपूज्य श्री बाबा मस्तरामजी के शिष्य परमपूज्य श्री बाबा ब्रह्मानंद से हुई जिनका जन्म सन् १९३१ में भारत के ईशा नगर में हुआ था। बाबा ब्रह्मानंद ने उन्हें दीक्षा मंत्र दिया।

 

भारत की कई यात्राओं में से एक में वृन्दावन के पावन शहर में उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई जो बाद में उनके प्रमुख शिक्षा गुरुओं में से एक थे। ये थे परमपूज्य श्रीला नरहरिदास बाबाजी महाराज, गौड़िय परंपरा के वैष्णव साधु, कृष्ण भगवान के परम भक्त एवं परमपूज्य श्रीला नित्यानंद दास बाबा के शिष्य। संत स्वभाव के बाबाजी ने प्रशांत जिज्ञासु को भक्तियोग का अमूल्य एवं महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं प्रशिक्षण दिया।

 

स्वामी रामकृष्णानंद की भक्तिपरायणता एवं श्री श्री राधा-कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा ने ही उन्हें कृष्ण भक्त से सन्यास जीवन के शपथ लेने की प्रेरणा दी। 'वृन्दा' के आश्रम में एक पौराणिक वैदिक समारोह में प्रचलित भक्तियोगी, परमपूज्य परमद्वैति स्वामी महाराज ने सन्यास जीवन की शपथ दी एवं उन्हें 'भक्तिवेदांत' की उपाधि से विभूषित किया।

 

सन् २००१ में परमपूज्य मां योगशक्ति ने स्वयं आपको दुर्गा देवी के मंत्र से दीक्षित किया।

सन् २००० में स्वामी रामकृष्णानंद अमरीका आए जहां पर उन्होंने अपने हृदय में होने वाले उद्गार व्यक्त करके अपने आपको समर्पित करने का निर्णय लिया। सन् २००३ में अमरीका में ही अपने अनेक शिष्यों के निवेदन पर उन्होंने पहली बार 'राम कृष्ण योग वेदांत मिशन' नामक एक प्रशिक्षण केंद्र प्रारंभ करने का निर्णय लिया जो एक हिंदू धार्मिक प्रतिष्ठान है।

 

स्वामी रामकृष्णानंद का जीवन सत्य की खोज, गुरु एवं शिक्षकों के प्रति समर्पण, आदर और सेवा का उदाहरण है - प्रभु के प्रति अतुलनीय प्रेम से भरा जीवन।

 

इनकी भक्ति और आत्मज्ञान की अलौकिक अनुभूति 'भक्तिवेदांत' की उपाधि को सार्थक करती है। पाश्चात्य देशों में इनके सम्मेलन, ग्रंथ एवं क्रियाकलापों के कारण, जिनमें उनकी प्रज्ञा, ज्ञान एवं भक्ति के गांभीर्य की गहरी छाप है, परमपूज्य स्वामीजी को सम्मानीय हिंदू समाज और जनसाधारण का स्नेह, प्रशंसा और सम्मान प्राप्त हुआ है।

 

ओम नमो भगवते रामकृष्णानंदः