परमपूज्य स्वामी कृष्णानंद सरस्वती

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आपका जन्म 25 अप्रैल, 1922 को एक रूढ़िवादी एवं धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। आपका नाम सुब्बाराय रखा गया। आप छः बच्चों में सबसे ज्येष्ठ थे। आपके परिवार के सभी सदस्य संस्कृत भाषा में निपुण थे जिसका गहन प्रभाव इस किशोर बालक के मन पर पड़ा। आपकी हाईस्कूल की पढ़ाई पुत्तूर (दक्षिण केनरा जिला, कर्नाटक राज्य) में हुई और आप अपनी कक्षा में सभी विषयों में प्रथम आते थे। कक्षा की पढ़ाई के स्तर से असंतुष्ट होकर आपने अमरकोश एवं धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से संस्कृत का स्वतः अध्ययन किया। आपने अपनी किशोरावस्था में ही भगवद् गीता का अध्ययन करके उसे कंठस्थ कर लिया। यह कार्य आपने एकदम सहज रूप से बिना किसी विशेष प्रयास के ही किया, प्रतिदिन निर्धारित किए गए पदों को कंठस्थ किए बगैर आप खाना नहीं खाते थे। बस, ऐसे ही कुछ ही महीनों में संपूर्ण गीता को कंठस्थ कर लिया एवं इसे हर रोज़ संपूर्णतः पढ़ते थे। धार्मिक ग्रंथों के पठन-पाठन में आपकी ऐसी ही लगन एवं श्रद्धा थी। श्रीमद् भागवत में नारायण के पवित्र धाम, बद्रीनाथ का उल्लेख पढ़ने के बाद आपके किशोर मन में हिमालय में स्थित बद्रीनाथ जाकर प्रभु के साक्षात दर्शन करने की प्रगाढ़ अभिलाषा जागृत हुई।

गीता एवं उपनिषद् आदि संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से आपके अंतर्मन में शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन के प्रति आपकी आस्था गहरी होती गई, हालांकि आप परंपरा से मध्व संप्रदाय के द्वैत दर्शन से संबंधित थे। आपके अंतर्मन में अद्वैत के अनुभव और सन्यास की गहन इच्छा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। सन् 1943 में आप बल्लारी जिले में हॉस्पेट में सरकारी नौकरी करने लगे जो ज़्यादा दिन तक टिकी नहीं। वर्ष के अंत

होने के पहले ही आप वाराणसी के लिए चल पड़े और वहां पर वेद एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में संलग्न हो गए। लेकिन एकांत की गहरी चाह एवं प्रभु के अज्ञात बुलावे से आप ऋषिकेश की ओर आकर्षित हुए जहां आपका आगमन सन् 1944 की गर्मी में हुआ। जब वे वहां स्वामी शिवानंद से मिले और उनको साष्टांग दंडवत किया, तब स्वामीजी ने आपसे कहा, 'यहां पर अपने जीवन के अंत तक रहो, मैं राजाओं एवं मंत्रियों को तुम्हारे चरणों में नमन कराऊंगा।' वह नौजवान जो अक्सर मन ही मन सोचता था कि ऐसा कैसे हो सकता है, उसे आज संत की भविष्यवाणी की अनुभूति हुई। स्वामी शिवानंद ने युवा सुब्बाराय को 14 जनवरी, 1946 को मकर संक्रांति के पावन अवसर पर सन्यास लेने की आज्ञा दी और स्वामी कृष्णानंद का नाम दिया।

श्री गुरुदेव ने यह पाया कि वह पत्र व्यवहार करने में, संदेश लिखने में, पुस्तकों के संपादन एवं संकलन आदि कार्यों में निपुण थे। बाद में उन्हें गुरुदेव के द्वारा लिखी गई पांडुलिपि को टाइप करने का काम सौंपा गया जो वह उन्हें रोज़ लाकर दिखाते थे। उदाहरण के लिए, गुरुदेव के हाथों से लिखे गए ब्रह्मसूत्रों के दो संपूर्ण ग्रंथों को स्वामी कृष्णानंद ने टाइप किया।

आप ज़्यादातर साहित्यिक कार्यों में ही संलग्न रहते एवं बाहर से आने वाले लोगों के साथ कोई संपर्क नहीं रकते थे, यहां तक कि आश्रम में आने वालों को यह भी पता नहीं चलता कि आप आश्रम में रहते हैं। सन् 1948 में गुरुदेव ने उनसे दर्शनशास्त्र एवं धर्म की पुस्तकें लिखने का सुझाव दिया जो कार्य उन्होंने गंभीरता से किया। कहा जा सकता है कि उस साल से आप गुरुदेव के आदेशानुसार लिखने, कक्षाएं चलाने एवं प्रवचन देने पर ज़्यादा ध्यान देने लगे। आपने अपनी प्रथम पुस्तक केवल चौदह दिनों में लिखी थी जिसका शीर्षक था 'परमसत्य की अनुभूति' (दी रियलाइज़ेशन ऑफ द ऐबसोल्यूट)। यह आपकी सर्वश्रेष्ठ पुस्तक है - एकदम स्पष्ट, सारगर्भित एवं प्रेरणादायक।

जब आश्रम के संचालन कार्य में दूसरे सदस्यों की आवश्यकता पड़ी, तब स्वामी कृष्णानंद को कार्यकारिणी समिति का, जिसका गठन सन् 1957 में हुआ था, सहयोगी बनाया गया। उस समय उन्हें सचिव के पद पर नियुक्त किया गया जिसमें आप वित्त संबंधी ज़िम्मेदारियों को संभालते थे। यह कार्य उन्होंने सन् 1961 तक निभाया जिसके दौरान स्वामी चिन्मयानंद की दीर्घकालीन अनुपस्थिति के कारण गुरुदेव ने उन्हें डिवाइन लाइफ सोसायटी' के महासचिव का कार्यभार सौंपा जिसे वे आज तक निभा रहें हैं। डिवाइन लाइफ सोसायटी के इतिहास में लिखा जा सकता है कि महासचिव के दुष्कर पद को पच्चीस साल तक न तो आज तक किसी ने निभाया है, न ही कोई आगे निभा पाएगा।

बिना किसी अतिशयोक्ति के भय के यह लिखा जा सकता है कि सभी धार्मिक ग्रंथों में प्रबुद्ध स्वामी कृष्णानंद ने ही योग वेदांत फोरेस्ट अकादमी में वेदांत के सभी धार्मिक ग्रंथों का प्रतिपादन किया है। यह आपने सुबह एवं मध्याह्न की कक्षाओं में एवं तीन महीनों के पाठ्यक्रम में किया जिसमें से अधिकांश साहित्य पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुआ है, जो योग के आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक एवं अभ्यास के विभिन्न पहलुओं पर आपकी प्रामाणिक टीकाएं हैं। इस तरह आप करीबन बीस पुस्तकों के लेखक हैं जिनमें से हरेक अपने आप में पाण्डित्यपूर्ण है। इतनी बड़ी संस्था के महासचिव की दिन प्रतिदिन की ज़िम्मेदारी निभाने के साथ-साथ ऐसा महान साहित्यिक कार्य सिर्फ आपके जैसे विद्वान द्वारा ही संभव है जिनमें ज्ञानयोग एवं कर्म योग का अभूतपूर्व संगम है एवं जिनका जीवन गीता की शिक्षा का जीवंत उदाहरण है।

आपके गुरु स्वामी शिवानंद की लेखनी इतनी प्रभावोत्पादक और विस्तृत है एवं उनकी साहित्यिक रचनाएं 300 से अधिक हैं। श्री गुरुदेव ने स्वामी कृष्णानंद को शिवानंद साहित्य अनुसंधान संस्था के अध्यक्ष के रूप

में 8 सितंबर, 1958 को संस्था के उद्घाटन के समय नियुक्त किया। बाद में भी एक बार फिर स्वामी कृष्णानंद को ही शिवानंद साहित्य प्रचार समिति के अध्यक्ष का पद सौंपा गया जिसकी स्थापना गुरुदेव की कृतियों को भारत की प्रमुख भाषाओं में अनुवाद कराने के लिए की गई थी। जब स्वामी शिवप्रेमानंद को अमरीका भेजा गया, तब सितंबर 1961 में स्वामी कृष्णानंद को संस्था की आधिकारिक मासिक पत्रिका 'दी डिवाइन लाइफ' का संपादक नियुक्त किया गया जिसका कार्यभार उन्होंने दो दशकों तक सफलतापूर्वक संभाला।

आप भारत एवं पश्चिम की प्रत्येक दार्शनिक पद्धति में प्रबुद्ध हैं। 'एक कृष्णानंद में बहुत सारे शंकर समा गए हैं' - श्री गुरुदेव का यह प्रशंसनीय कथन उनके लेख में है जिसका शीर्षक है, 'मैं कृष्णानंदजी से अभिभूत हूं।'