परमपूजà¥à¤¯
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द
सरसà¥à¤µà¤¤à¥€
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यहां दबाइà¤
आपका जनà¥à¤® 25 अपà¥à¤°à¥ˆà¤², 1922
को à¤à¤• रूढ़िवादी à¤à¤µà¤‚
धारà¥à¤®à¤¿à¤• बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£ परिवार
में हà¥à¤† था। आपका नाम
सà¥à¤¬à¥à¤¬à¤¾à¤°à¤¾à¤¯ रखा गया। आप छः
बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ में सबसे
जà¥à¤¯à¥‡à¤·à¥à¤ थे। आपके
परिवार के सà¤à¥€ सदसà¥à¤¯
संसà¥à¤•ृत à¤à¤¾à¤·à¤¾ में निपà¥à¤£ थे
जिसका गहन पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ इस किशोर
बालक के मन पर पड़ा। आपकी
हाईसà¥à¤•ूल की पढ़ाई
पà¥à¤¤à¥à¤¤à¥‚र (दकà¥à¤·à¤¿à¤£ केनरा
जिला, करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿà¤• राजà¥à¤¯) में
हà¥à¤ˆ और आप अपनी ककà¥à¤·à¤¾ में
सà¤à¥€ विषयों में पà¥à¤°à¤¥à¤® आते
थे। ककà¥à¤·à¤¾ की पढ़ाई के
सà¥à¤¤à¤° से असंतà¥à¤·à¥à¤Ÿ होकर
आपने अमरकोश à¤à¤µà¤‚ धारà¥à¤®à¤¿à¤•
गà¥à¤°à¤‚थों के माधà¥à¤¯à¤® से
संसà¥à¤•ृत का सà¥à¤µà¤¤à¤ƒ अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨
किया। आपने अपनी
किशोरावसà¥à¤¥à¤¾ में ही à¤à¤—वदà¥
गीता का अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ करके उसे
कंठसà¥à¤¥ कर लिया। यह
कारà¥à¤¯ आपने à¤à¤•दम सहज रूप
से बिना किसी विशेष पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸
के ही किया, पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨
निरà¥à¤§à¤¾à¤°à¤¿à¤¤ किठगठपदों को
कंठसà¥à¤¥ किठबगैर आप खाना
नहीं खाते थे। बस, à¤à¤¸à¥‡ ही
कà¥à¤› ही महीनों में संपूरà¥à¤£
गीता को कंठसà¥à¤¥ कर लिया
à¤à¤µà¤‚ इसे हर रोज़ संपूरà¥à¤£à¤¤à¤ƒ
पढ़ते थे। धारà¥à¤®à¤¿à¤•
गà¥à¤°à¤‚थों के पठन-पाठन
में आपकी à¤à¤¸à¥€ ही लगन à¤à¤µà¤‚
शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾ थी। शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥
à¤à¤¾à¤—वत में नारायण के
पवितà¥à¤° धाम, बदà¥à¤°à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ का
उलà¥à¤²à¥‡à¤– पढ़ने के बाद आपके
किशोर मन में हिमालय में
सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ बदà¥à¤°à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ जाकर
पà¥à¤°à¤à¥ के साकà¥à¤·à¤¾à¤¤ दरà¥à¤¶à¤¨
करने की पà¥à¤°à¤—ाढ़ अà¤à¤¿à¤²à¤¾à¤·à¤¾
जागृत हà¥à¤ˆà¥¤
गीता à¤à¤µà¤‚ उपनिषदॠआदि
संसà¥à¤•ृत गà¥à¤°à¤‚थों के
अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ से आपके अंतरà¥à¤®à¤¨
में शंकराचारà¥à¤¯ के अदà¥à¤µà¥ˆà¤¤
दरà¥à¤¶à¤¨ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ आपकी आसà¥à¤¥à¤¾
गहरी होती गई, हालांकि आप
परंपरा से मधà¥à¤µ संपà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯
के दà¥à¤µà¥ˆà¤¤ दरà¥à¤¶à¤¨ से संबंधित
थे। आपके अंतरà¥à¤®à¤¨ में
अदà¥à¤µà¥ˆà¤¤ के अनà¥à¤à¤µ और सनà¥à¤¯à¤¾à¤¸
की गहन इचà¥à¤›à¤¾ दिन पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨
बढ़ती जा रही थी। सनॠ1943 में
आप बलà¥à¤²à¤¾à¤°à¥€ जिले में
हॉसà¥à¤ªà¥‡à¤Ÿ में सरकारी नौकरी
करने लगे जो ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ दिन
तक टिकी नहीं। वरà¥à¤· के
अंत
होने के पहले ही आप
वाराणसी के लिठचल पड़े और
वहां पर वेद à¤à¤µà¤‚ अनà¥à¤¯
धारà¥à¤®à¤¿à¤• गà¥à¤°à¤‚थों के
अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ में संलगà¥à¤¨ हो गà¤à¥¤
लेकिन à¤à¤•ांत की गहरी चाह
à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¤à¥ के अजà¥à¤žà¤¾à¤¤
बà¥à¤²à¤¾à¤µà¥‡ से आप ऋषिकेश की ओर
आकरà¥à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤ जहां आपका
आगमन सनॠ1944 की गरà¥à¤®à¥€ में
हà¥à¤†à¥¤ जब वे वहां सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
शिवानंद से मिले और उनको
साषà¥à¤Ÿà¤¾à¤‚ग दंडवत किया, तब
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€à¤œà¥€ ने आपसे कहा,
'यहां पर अपने जीवन के अंत
तक रहो, मैं राजाओं à¤à¤µà¤‚
मंतà¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को तà¥à¤®à¥à¤¹à¤¾à¤°à¥‡
चरणों में नमन कराऊंगा।'
वह नौजवान जो अकà¥à¤¸à¤° मन ही
मन सोचता था कि à¤à¤¸à¤¾ कैसे हो
सकता है, उसे आज संत की
à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯à¤µà¤¾à¤£à¥€ की अनà¥à¤à¥‚ति
हà¥à¤ˆà¥¤ सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ शिवानंद ने
यà¥à¤µà¤¾ सà¥à¤¬à¥à¤¬à¤¾à¤°à¤¾à¤¯ को 14 जनवरी,
1946 को मकर संकà¥à¤°à¤¾à¤‚ति के
पावन अवसर पर सनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ लेने
की आजà¥à¤žà¤¾ दी और सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द का नाम दिया।
शà¥à¤°à¥€ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ ने यह
पाया कि वह पतà¥à¤° वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤°
करने में, संदेश लिखने में,
पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों के संपादन à¤à¤µà¤‚
संकलन आदि कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में
निपà¥à¤£ थे। बाद में उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚
गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखी गई
पांडà¥à¤²à¤¿à¤ªà¤¿ को टाइप करने का
काम सौंपा गया जो वह
उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ रोज़ लाकर दिखाते
थे। उदाहरण के लिà¤,
गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ के हाथों से लिखे
गठबà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¸à¥‚तà¥à¤°à¥‹à¤‚ के दो
संपूरà¥à¤£ गà¥à¤°à¤‚थों को
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द ने टाइप
किया।
आप ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾à¤¤à¤°
साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में ही
संलगà¥à¤¨ रहते à¤à¤µà¤‚ बाहर से
आने वाले लोगों के साथ कोई
संपरà¥à¤• नहीं रकते थे, यहां
तक कि आशà¥à¤°à¤® में आने वालों
को यह à¤à¥€ पता नहीं चलता कि
आप आशà¥à¤°à¤® में रहते हैं।
सनॠ1948 में गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ ने उनसे
दरà¥à¤¶à¤¨à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤µà¤‚ धरà¥à¤® की
पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ें लिखने का सà¥à¤à¤¾à¤µ
दिया जो कारà¥à¤¯ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने
गंà¤à¥€à¤°à¤¤à¤¾ से किया। कहा जा
सकता है कि उस साल से आप
गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ के आदेशानà¥à¤¸à¤¾à¤°
लिखने, ककà¥à¤·à¤¾à¤à¤‚ चलाने à¤à¤µà¤‚
पà¥à¤°à¤µà¤šà¤¨ देने पर ज़à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾
धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ देने लगे। आपने अपनी
पà¥à¤°à¤¥à¤® पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• केवल चौदह
दिनों में लिखी थी जिसका
शीरà¥à¤·à¤• था 'परमसतà¥à¤¯ की
अनà¥à¤à¥‚ति' (दी रियलाइज़ेशन
ऑफ द à¤à¤¬à¤¸à¥‹à¤²à¥à¤¯à¥‚ट)। यह आपकी
सरà¥à¤µà¤¶à¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• है -
à¤à¤•दम सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ, सारगरà¥à¤à¤¿à¤¤
à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾à¤¦à¤¾à¤¯à¤•।
जब आशà¥à¤°à¤® के संचालन
कारà¥à¤¯ में दूसरे सदसà¥à¤¯à¥‹à¤‚
की आवशà¥à¤¯à¤•ता पड़ी, तब
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द को
कारà¥à¤¯à¤•ारिणी समिति का,
जिसका गठन सनॠ1957 में हà¥à¤†
था, सहयोगी बनाया गया। उस
समय उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सचिव के पद पर
नियà¥à¤•à¥à¤¤ किया गया जिसमें
आप वितà¥à¤¤ संबंधी
ज़िमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को
संà¤à¤¾à¤²à¤¤à¥‡ थे। यह कारà¥à¤¯
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने सनॠ1961 तक निà¤à¤¾à¤¯à¤¾
जिसके दौरान सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
चिनà¥à¤®à¤¯à¤¾à¤¨à¤‚द की
दीरà¥à¤˜à¤•ालीन अनà¥à¤ªà¤¸à¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿
के कारण गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚
डिवाइन लाइफ सोसायटी' के
महासचिव का कारà¥à¤¯à¤à¤¾à¤°
सौंपा जिसे वे आज तक निà¤à¤¾
रहें हैं। डिवाइन लाइफ
सोसायटी के इतिहास में
लिखा जा सकता है कि
महासचिव के दà¥à¤·à¥à¤•र पद को
पचà¥à¤šà¥€à¤¸ साल तक न तो आज तक
किसी ने निà¤à¤¾à¤¯à¤¾ है, न ही कोई
आगे निà¤à¤¾ पाà¤à¤—ा।
बिना किसी
अतिशयोकà¥à¤¤à¤¿ के à¤à¤¯ के यह
लिखा जा सकता है कि सà¤à¥€
धारà¥à¤®à¤¿à¤• गà¥à¤°à¤‚थों में
पà¥à¤°à¤¬à¥à¤¦à¥à¤§ सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द ने ही योग
वेदांत फोरेसà¥à¤Ÿ अकादमी
में वेदांत के सà¤à¥€ धारà¥à¤®à¤¿à¤•
गà¥à¤°à¤‚थों का पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨
किया है। यह आपने सà¥à¤¬à¤¹ à¤à¤µà¤‚
मधà¥à¤¯à¤¾à¤¹à¥à¤¨ की ककà¥à¤·à¤¾à¤“ं में
à¤à¤µà¤‚ तीन महीनों के
पाठà¥à¤¯à¤•à¥à¤°à¤® में किया
जिसमें से अधिकांश
साहितà¥à¤¯ पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों के रूप
में पà¥à¤°à¤•ाशित हà¥à¤† है, जो
योग के आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤•,
मनोवैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• à¤à¤µà¤‚ अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸
के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पहलà¥à¤“ं पर आपकी
पà¥à¤°à¤¾à¤®à¤¾à¤£à¤¿à¤• टीकाà¤à¤‚ हैं। इस
तरह आप करीबन बीस पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों
के लेखक हैं जिनमें से
हरेक अपने आप में
पाणà¥à¤¡à¤¿à¤¤à¥à¤¯à¤ªà¥‚रà¥à¤£ है। इतनी
बड़ी संसà¥à¤¥à¤¾ के महासचिव की
दिन पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¦à¤¿à¤¨ की
ज़िमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¾à¤°à¥€ निà¤à¤¾à¤¨à¥‡ के
साथ-साथ à¤à¤¸à¤¾ महान
साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• कारà¥à¤¯ सिरà¥à¤«
आपके जैसे विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾
ही संà¤à¤µ है जिनमें
जà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¯à¥‹à¤— à¤à¤µà¤‚ करà¥à¤® योग का
अà¤à¥‚तपूरà¥à¤µ संगम है à¤à¤µà¤‚
जिनका जीवन गीता की शिकà¥à¤·à¤¾
का जीवंत उदाहरण है।
आपके गà¥à¤°à¥ सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
शिवानंद की लेखनी इतनी
पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥‹à¤¤à¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤• और
विसà¥à¤¤à¥ƒà¤¤ है à¤à¤µà¤‚ उनकी
साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• रचनाà¤à¤‚ 300 से
अधिक हैं। शà¥à¤°à¥€ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ ने
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द को
शिवानंद साहितà¥à¤¯
अनà¥à¤¸à¤‚धान संसà¥à¤¥à¤¾ के
अधà¥à¤¯à¤•à¥à¤· के रूप
में 8 सितंबर, 1958 को
संसà¥à¤¥à¤¾ के उदà¥à¤˜à¤¾à¤Ÿà¤¨ के समय
नियà¥à¤•à¥à¤¤ किया। बाद में à¤à¥€
à¤à¤• बार फिर सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द को ही शिवानंद
साहितà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤šà¤¾à¤° समिति के
अधà¥à¤¯à¤•à¥à¤· का पद सौंपा गया
जिसकी सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ की
कृतियों को à¤à¤¾à¤°à¤¤ की पà¥à¤°à¤®à¥à¤–
à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤“ं में अनà¥à¤µà¤¾à¤¦ कराने
के लिठकी गई थी। जब सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€
शिवपà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¾à¤¨à¤‚द को अमरीका
à¤à¥‡à¤œà¤¾ गया, तब सितंबर 1961 में
सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द को
संसà¥à¤¥à¤¾ की आधिकारिक मासिक
पतà¥à¤°à¤¿à¤•ा 'दी डिवाइन लाइफ'
का संपादक नियà¥à¤•à¥à¤¤ किया
गया जिसका कारà¥à¤¯à¤à¤¾à¤°
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दो दशकों तक
सफलतापूरà¥à¤µà¤• संà¤à¤¾à¤²à¤¾à¥¤
आप à¤à¤¾à¤°à¤¤ à¤à¤µà¤‚ पशà¥à¤šà¤¿à¤®
की पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤•
पदà¥à¤§à¤¤à¤¿ में पà¥à¤°à¤¬à¥à¤¦à¥à¤§ हैं।
'à¤à¤• कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚द में बहà¥à¤¤
सारे शंकर समा गठहैं' -
शà¥à¤°à¥€ गà¥à¤°à¥à¤¦à¥‡à¤µ का यह
पà¥à¤°à¤¶à¤‚सनीय कथन उनके लेख
में है जिसका शीरà¥à¤·à¤• है,
'मैं कृषà¥à¤£à¤¾à¤¨à¤‚दजी से
अà¤à¤¿à¤à¥‚त हूं।'