पंच नित्य कर्म

संस्कृत में 'पंच नित्य कर्म' का अर्थ है 'हर हिंदू के पांच नित्य कर्तव्य'। जब इन धार्मिक कर्तव्यों का पर्याप्त पालन होता है, तब वे हमें ईश्वर के निकट ले जाते हैं और आत्मस्वरूप की अनुभूति कराते हैं।

 

1) उपासना - घर में देव-स्थल पर या मंदिर में पूजा करना। यह वह धार्मिक शिक्षा है जो बच्चों को घर में मिलती है जहां वे बड़ों को घर में प्रतिदिन देव-स्थल के समक्ष विधिवत अनुष्ठान करते हुए देखकर उनका अनुकरण करते हैं।

 

2) उत्सव - घर में और मंदिर में हिंदुओं के पवित्र दिनों और उत्सवों में शरीक होने के लिए बच्चों में संस्कार डालना। एकादशी पर उपवास करना और साथ ही त्योहारों के दौरान मंदिर जाना भी उत्सव के

अंतर्गत ही है।

 

3) धर्म - नैतिक जीवन जीना। बच्चों को संस्कार देने चाहिए ताकि वे सदाचार एवं नैतिक मूल्यों से भरा जीवन जिएं, अपने कर्तव्य का पालन करें एवं सद्व्यवहार बनाए रखें, बुज़ुर्गों एवं सन्यासियों का आदर करें, जीवन में धार्मिक मूल्यों को महत्व दें, खास तौर से अहिंसा के सिद्धांत पर अटल रहें, मन, वचन या कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट या पीड़ा न दें, बच्चों एवं युवाओं को हिंदुत्व, उसके धार्मिक ग्रंथ एवं उसके महान संतों एवं गुरुओं के अनुकरणीय जीवन के बारे में शिक्षा दें। ये भावी पीढ़ी की उन्नति, विकास एवं परिपक्वता के माध्यम हैं।


4) तीर्थ यात्रा - बच्चों को पवित्र स्थलों एवं मंदिरों की तीर्थ यात्रा का महत्व बताना जिससे गुरुजनों के दर्शन से आशीर्वचन एवं प्रेरणा मिले। यह ज़रूरी है कि बच्चे ऐसी यात्राओं के दौरान धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त करें जहां का लक्ष्य इंद्रियों की परितृप्ति नहीं हो, बल्कि ईश्वर, गुरु एवं धर्म का ज्ञान हो।

 

5) संस्कार - शास्त्रोक्त कर्म एवं धार्मिक अनुष्ठानों का मार्ग। बच्चों को हिंदू धर्म के संस्कारों का पालन करना सिखाया जाए जिसमें जीवन के विभिन्न सोपानों के पवित्रीकरण पर महत्व दिया जाता है। यह बहुत ही ज़रूरी है कि किशोरावस्था से ही बच्चों को संस्कारों के अर्थ एवं अपनी परंपरा, संस्कृति और धर्म के प्रति आस्था पर ज़ोर दिया जाए।