हिंदू धर्म के दस तत्त्व
किसी भी धर्म के मूल तत्त्व उस धर्म को मानने वालों के विचार,
मान्यताएं एवं आचार तथा संसार एवं लोगों के प्रति उनके दृष्टिकोण को
ढालते हैं। हिंदू धर्म की निम्न मान्यताएं हैं:
1) हिंदू धर्म का हर अनुयायी सिर्फ एक ईश्वर, एक सत्य में विश्वास
करता है जो एक साथ परात्पर एवं अंतर्निहित है, सृष्टा भी है और सृष्टि
भी। शिव, राम, कृष्ण आदि जैसे अलग-अलग रूप और कुछ नहीं, सिर्फ एक सत्य
के अलग-अलग पहलू हैं, एक सर्वव्याप्त, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, एक
रहस्य जिसे सिर्फ प्रत्यक्ष धार्मिक समागम के द्वारा जाना जा सकता
है।
2) हिंदू धर्म ऋषियों द्वारा उद्भासित पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं
अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर श्रद्धा रखता है जो
सनातन धर्म के परात्पर इमारत की सुदृढ़ नींव है।
3) हिंदू धर्म की मान्यता है कि सृष्टि निर्माण, रक्षण एवं विघटन
की अनंत प्रक्रिया पर चलती है, जिसकी पुष्टि भगवद्गीता में की गई है।
'जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब सब कुछ अव्यक्त से व्यक्त हो जाता
है और जैसे ही रात होने लगती है, सब कुछ वापस आकर अव्यक्त में लीन हो
जाता है।' (8.18)
4) हिंदू धर्म कर्म एवं कार्य-कारण के सिद्धांत को मानता है जिसके
अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं ही
उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से
अपनी नियति स्वयं तय करता है।
5) हिंदू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। इसका अर्थ है कि
आत्मा जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की शिक्षात्मक प्रक्रिया
से गुज़रती हुई अपने पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर धारण करती है।
उसकी यह भी मान्यता है कि प्रत्येक आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है, जैसा
भगवद् गीता में कहा गया है (2.13)।
'जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती
है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष
मोहित नहीं होता।'
6) हिंदू धर्म अनेक महान और शक्तिशाली सत्ताओं में विश्वास करता है
जो भौतिक इंद्रियों के लिए अदृश्य हैं, जिन्हें देवता कहा जाता है।
उसका दृढ़ विश्वास है कि मंदिर में पूजा एवं अनेकों संस्कारों के
दौरान किए गए अनुष्ठान मानवता एवं इन देवताओं के बीच गहरा धार्मिक
समागम स्थापित करते हैं।
7) हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि किसी भी अनुयायी के लिए एक
गुरु या प्रामाणिक आध्यात्मिक शिक्षक का मार्ग दर्शन आवश्यक है, और
आध्यात्मिक गुरु की शरण में गए बिना अध्यात्म-मार्ग पर आगे बढ़ना
असंभव है। भगवद् गीता में इसकी पुष्टि की गई है (4.34)।
'उस ज्ञान को तू तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भली
भांति दंडवत प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर
सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्मतत्त्व को भलीभांति जानने वाले
ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश देंगे।'
8) हिंदू धर्म की मान्यता है कि जीवन अपने सभी स्वरूपों में पवित्र
है और इसीलिए वह आदर, प्रेम एवं पूजा के योग्य है। वह पशु हत्या,
मांसाहार या किसी भी जीवित प्राणी को मन, वचन एवं कर्म से दुख या
क्लेश पहुंचाना स्वीकार नहीं करता है।
9) हिंदू धर्म नहीं मानता कि ऐसा कोई अपूर्व धर्म है जो ईश्वर या
सत्य का मालिक एवं गुरु हो सकता है। अलबत्ता, उसकी यह समझ है कि हम
सभी पूर्ण सत्यानुभूति के मार्ग पर विकास एवं उत्थान की अलग श्रेणियों
पर बसे हैं। अतः एक धर्म के रूप में हिंदुत्व दूसरे हर विश्वास, आस्था
या धर्म को सहनशक्ति, समझ एवं आदर के साथ स्वीकार करता है एवं दूसरे
धर्मों से अपने प्रति वैसे ही या उससे मिलते-जुलते व्यवहार की अपेक्षा
करता है।
ऋग्वेद दूसरे धर्मों के प्रति हमारे व्यवहार को इन शब्दों में
व्यक्त करता है, 'आनो भद्रा कृत्वा यान्तु विश्वतः' जिसका अर्थ है कि
किसी भी सदविचार को अपनी तरफ किसी भी दिशा से आने दें। ये शब्द सनातन
धर्म एवं धर्मनिष्ठ साधक के सच्चे व्यवहार को दर्शाते हैं।
10) हिंदू धर्म का प्रत्येक अनुयायी सभी धर्मों के सारे साधु एवं
संतों को समान आदर देता है।