सन्यास
'यह पथ धार्मिक रहस्यवाद का पथ है, साधु का मार्ग जिसे
वैदिक परंपरा में सन्यास कहा जाता है। एक सन्यासी अपने जीवन को
आध्यात्मिक मार्ग में परिवर्तित करता है, एक ही उद्देश्य से कि स्वयं
को प्रभु में लीन करके प्रभु से प्रेम करे। प्रभु से प्रतिदिन का मिलन
एवं खोज ही उसके जीवन का सार्थक आधार है। यही अनुभूति उसका स्वप्न एवं
सांत्वना है जो उसके जीवन को दिन प्रतिदिन गहराई एवं प्रगति से भर
देता है। एक सन्यासी बनने के लिए बस इतना ही ज़रूरी है कि ईश्वर में
विश्वास रखे, ईश्वर के साथ रहे एवं ईश्वर के लिए जिए।'
विष्णुपद आचार्य
'कभी न भूलें और अपने बच्चों को सिखाइए कि जुगनू एवं
धधकते सूरज में, अनंत सागर एवं एक छोटे तालाब में, मेरु पर्वत एवं राई
के दाने में जो फर्क है, वहीं फर्क एक सन्यासी एवं गृहस्थ में
है।'
पूरी संप्रदाय के स्वामी विवेकानंद
'सन्यास का अर्थ है जीने के लिए मरना। वह मनुष्य के
स्थूल स्वार्थी जीवन की पूर्ण मृत्यु है, जो साधारण व्यक्ति की तरह
भौतिक क्षेत्र पर जीने का आदी हो चुका है। सन्यास एक नए जीवन का जन्म
है जहां 'व्यक्ति' का अंत हो जाता है, और उसके विलक्षण व्यक्तित्व के
नए जन्म के आवाहन में समग्र सृष्टि उसके समक्ष खड़ी हो जाती है और वह
विश्व प्रेम का अद्भुत स्वरूप धारण कर लेता है। ऐसा करने के लिए वह
घोषित करता है कि समग्र सृष्टि उसके भीतर है और किसी भी प्राणी को
उससे डरने की ज़रूरत नहीं। वह इस धरती के सभी जीवों को अभयदान देता है
क्योंकि वह और कुछ नहीं, सिर्फ प्रेम है, और कुछ नहीं, सिर्फ त्याग
है। सन्यास दीक्षा समारोह के दौरान लिए गए प्रण के अनुसार उसके अंतर
से करुणा उजागर होती है। ओम।'
परमपूज्य चिदानंद स्वामी, डिवाइन लाइफ सोसाइटी
एक सच्चा सन्यासी धर्मनिष्ठ होता है। उसके विचार एवं
कर्म ईश्वर के चारों ओर घूमते रहते हैं। इस प्रवृत्ति
के बावजूद वह स्वयं और दूसरों के प्रति अपने कर्तव्य का
परित्याग नहीं करता है। वह करुणा एवं निःस्वार्थ प्रेम से संचालित
होकर कर्मों के फल की अपेक्षा नहीं करता। वह अपना जीवन प्रभु को भेंट
करके अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर देता है। वह जीवन की अशुद्धताओं
से लिप्त नहीं होता क्योंकि उसमें तटस्थता और अनुशासन है, अहं और गर्व
का अभाव है, कर्ता होने का झूठा अहसास नहीं है और फलस्वरूप वह
पापकर्मों से निर्लिप्त रहता है। त्याग ही आध्यात्मिक अनुशासन का सबसे
उच्च रूप है क्योंकि त्याग के तुरंत बाद ही शांति मिल जाती है।
जयराम वी.
आज विश्व में हिंदू धर्म के 90 करोड़ अनुयायी हैं और
अनुयायियों की इस संख्या के फलस्वरूप अपना धर्म तीसरे स्थान पर है,
ईसाई एवं इस्लाम धर्म के बाद। भारत में लगभग 30 लाख मठवासी, सन्यासी
एवं साधु हैं। रामकृष्ण मिशन में लगभग 700 मठवासी हैं, स्वामीनारायण
संप्रदाय में 800 एवं हिंदू धर्म के अलग संस्थानों में हज़ारों की
संख्या में मठवासी हैं। आम तौर पर हिंदू समाज में सन्यासी अल्प संख्या
में हैं।
हमारे धर्म के मंदिरों की संख्या लगभग पांच लाख तक आंकी
जाती है जिसमें से एक हज़ार अमरीका में हैं जहां प्रतिवर्ष हज़ारों
अनुयायी दर्शन करते हैं।
अमरीकी सरकार के अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता के
विभाग की वर्ष 2004 की रपट के अनुसार अमरीका में हिंदुओं की संख्या
लगभग 1,478,670 या समग्र जनसंख्या का 0.5 प्रतिशत है। यह संख्या उन
देशों के आप्रवासी जहां हिंदू धर्म मूल धर्म है, या उनके वंशज, एवं वे
उत्तर अमरीकी जिन्होंने परिवर्तित होकर हिंदू धर्म को अपनाया है, इन
सभी को मिलाकर ली गई है।
अमरीकी हिंदू आधुनिक युग में अमरीकी न्याय प्रणाली के
अनुसार विदित एवं वास्तविक समानता का लाभ ले रहे हैं। दक्षिण एशिया
एवं युरोप में कई हिंदू पीढ़ियों ने अमरीका में अपने घर बसाकर व्यवसाय
किए हैं, अपने परिवारों का पालन-पोषण किया है, मकान खरीदे हैं और अपनी
जड़ों को जमाया है। उन्होंने अपने धर्म एवं संस्कृति को अमरीका की
बहुमुखी संस्कृति के साथ एकीकृत कर दिया है।
ऊपर बताए गए दृष्टांत से स्पष्ट ज़ाहिर है कि यह
अपेक्षित नहीं है कि पौराणिक हिंदू धर्म के सभी भक्तगण एवं अनुयायी उस
कठोर सन्यास मार्ग पर अग्रसर हो सकेंगे जो सिर्फ उन लोगों के लिए
आरक्षित है जिन्होंने प्रभु के आवाहन को महसूस किया और उस मार्ग को
अपनाया है जो आश्रम या मठ के कठिन जीवन की मांग है। हिंदू धर्म में हर
वक्त ऐसे साधक रहे हैं जिनका सांसारिक सुखों की अपेक्षा ईश्वर के
प्रति अधिक झुकाव है। उनमें से कुछ एकांत में भिक्षुक जीवन व्यतीत
करते हैं और बाकी आश्रमों एवं मठों में मिलजुल कर रहते हैं।
इसीलिए भक्तिवेदान्त वैदिक प्रतिष्ठान ने जनसाधारण के
हित के लिए मंदिरों एवं योग केंद्रों के निर्माण के साथ-साथ अपने
आश्रमों एवं निवासीय मठों की स्थापना की है। यहां वे साधक हैं
जिन्होंने हिंदू धर्म के सन्यास मार्ग को अपनाकर विनम्रता, सेवा एवं
पवित्रता के व्रतों को अंगीकार किया है और हमारे उन मठवासियों एवं
सन्यासियों के साथ रहते हैं जो ब्रह्मचर्य जीवन का पूर्ण रूप से पालन
कर रहे हैं।
हम आपका हार्दिक आमंत्रण करते हैं। अगर आप अपनी आत्मा
में प्रभु की पुकार को महसूस करते हैं और 25 वर्ष से बड़े हैं, तो आप
हमारे संस्थान में सम्मिलित हो सकते हैं। भक्तिवेदान्त रामकृष्णानंद
वैदिक संस्थान
के सदस्य विभिन्न देशों एवं संस्कृतियों से हैं
जिन्होंने हिंदुत्व को अपना धर्म मानकर अपनाया है। हम मठों या आश्रमों
में रहकर अपने आपको संसार से तटस्थ करके ध्यान, पूजा, सेवा एवं वैदिक
ग्रंथों के पठन-पाठन में अपना जीवन संवारकर उसे मानवता के प्रेरणा
स्रोत में परिवर्तित करते हैं।