हिंदू धर्म की आचरण संहिता
हिंदू धर्म में आचरण के सख्त नियम हैं जिनका उसके
अनुयायी प्रतिदिन जीवन में पालन करते हैं। उनमें दस यम या प्रतिबंध
हैं और दस नियम हैं। यह सनातन धर्म का नैतिक अनुशासन है जिसके समर्थन
के बिना आध्यात्मिक उत्कर्ष निश्चित रूप से असंभव है।
यम या प्रतिबंध -
1) अहिंसा - किसी भी जीवित प्राणी को मन, वचन या कर्म से
दुख या हानि नहीं पहुंचाना। स्वयं एवं दूसरों के प्रति करुणा का भाव।
जीवन में इस विचार पर चिंतन करना चाहिए कि सभी प्राणी ईश्वर की
दिव्यता के विभिन्न स्वरूप हैं। जैसे हम स्वयं से प्रेम करते हैं,
वैसे ही हमें दूसरों को भी प्रेम और आदर देना चाहिए।
2) सत्य - सत्य में जीना, मन, वचन और कर्म से सत्यनिष्ठ
रहना, दिए हुए वचनों को निभाना, प्रियजनों से कोई गुप्त बात नहीं
रखना। हमेशा सत्य वचन कहना, लेकिन इस बात का ख्याल रखना एवं सचेत रहना
कि बिना कारण किसी को हानि या क्लेश न पहुंचे। कहने का अभिप्राय है कि
हमारी सत्यनिष्ठा एवं अहिंसक आचरण में असंगति न हो।.
3) अस्तेय - चोरी नहीं करना। जो वस्तु दूसरों की हो, उसे
नहीं लेना। चोरी उस अज्ञान का परिणाम है जिसके कारण हम यह मानने लगते
हैं कि हमारे पास किसी वस्तु की कमी है या हम उसके योग्य नहीं हैं। यह
आवश्यक है कि हम अपने अंदर के सौंदर्य को देखना सीखें, हमारे अंदर के
वैभव को देखें और यह समझ सकें कि दूसरों की वस्तु की आकांक्षा करना
आंतरिक कमज़ोरी का परिणाम है। यह भी अपेक्षित है कि दांव-पेच एवं अवैध
तरीकों से स्वयं का लाभ न करें।
4) ब्रह्मचर्य - यौन निग्रह, ऊर्जा संरक्षण, संयम,
कौमार्य व्रत। यौन अतिक्रम से बचना, विवाह से पहले अपनी पूरी शक्ति
अध्ययन एवं प्रशिक्षण में लगाना, विवाह के पश्चात दांपत्य ढांचे के
अंदर एवं प्रजनन के लक्ष्य से ही
यौन क्रिया करना। यौन क्रिया सिर्फ इंद्रियों के उपभोग
और संतोष का माध्यम ही नहीं हो। ब्रह्मचर्य का पालन करने में काफी
बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे योनिक बातचीत एवं मज़ाक, अश्लील
चित्र एवं चलचित्र का निषेध। स्त्री और पुरुष को आपस में बातचीत करते
समय मर्यादित ढंग से पेश आना चाहिए।
5) क्षमा - धैर्य, दूसरों के प्रति संतोषी एवं सहनशील
बने रहना। हम समग्र विश्व को अपने विचारों के अनुकूल बनाने की कोशिश
नहीं कर सकते, हर व्यक्ति का अपना चरित्र एवं आदतें हैं जो उसके बचपन
एवं जीवन का प्रभाव है। यह ज़रूरी है कि हम दूसरों के प्रति धैर्य एवं
करुणा से पेश आएं एवं उन्हें समझने की कोशिश करें, परिवार एवं बच्चों,
पड़ोसी एवं सहकर्मियों के प्रति सहनशील रहें। सनातन धर्म के हर
अनुयायी को दूसरों के साथ एवं जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों के प्रति
धैर्य एवं सहनशीलता का उदाहरण होना चाहिए।
6) धृति - स्थिरता, चरित्र की दृढ़ता एवं ताकत। जीवन में
जो भी क्षेत्र हम चुनते हैं, उसमें उन्नति एवं विकास के लिए यह ज़रूरी
है कि निरंतर कोशिश करते रहें एवं स्थिर रहें। जो जानता है कि उसे
जीवन में क्या चाहिए, वह एक परिपक्व व्यक्ति है और किसी भी तरह की
कठिनाई के सामने आसानी से नहीं झुकेगा।
7) दया - करुणा, यह हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए एक
बहुत आवश्यक गुण है। यह हमारी उस जीवन दृष्टि का परिणाम है जो
प्रत्येक प्राणी में एक दिव्य स्वरूप का दर्शन करती है और जिसके
फलस्वरूप हम प्रत्येक प्राणी को मात्र वस्तु के रूप में नहीं देखकर
आत्मा के रूप में देख पाते हैं।
8) आर्जव - सरलता, दूसरों को नहीं छलना, अपने प्रति एवं
दूसरों के प्रति ईमानदारी से पेश आना। हमारे चारों ओर फैली हुई और
हमारे अंदर - दोनों प्रकार की धोखाधड़ी का संपूर्णतः त्याग।
9) मिताहार - भोजन का संयम, यह ज़रूरी है कि हम जीने के
लिए खाएं न कि खाने के लिए जिएं। स्वस्थ खाना खाकर एक स्वस्थ ज़िंदगी
जीने में एवं अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए भोजन करके खाने को
व्यसन बनाने में बहुत फर्क है। यह आवश्यक है कि नियत समय पर खाना
खाएं, मांस, अंडे एवं मछली न खाएं और केवल उस भोजन को स्वीकार करें जो
ईश्वर के भोग लगाया गया हो। होटलों एवं ऐसे स्थानों में जहां हम नहीं
जानते कि खाना किसके द्वारा या कैसे बनाया गया है, वहां न खाएं।
10) शौच - स्वच्छता, आंतरिक एवं बाहरी पवित्रता। इसका
अर्थ है कि हम अपने शरीर एवं उसके वातावरण को पूर्ण रूप से स्वच्छ
रखें, इसका पालन हिंदू धर्म के प्रत्येक अनुयायी को करना चाहिए।
हमारा पर्यावरण हमारे अंतर का प्रतिबिंब है, यानि हमारे
वातावरण की स्वच्छता एवं व्यवस्था का हमारे अंतर्मन पर सात्विक प्रभाव
पड़ता है। सफाई ईश्वर को, दिव्यता को हमारे पास खींचती है। यह बहुत
ज़रूरी है कि हम मौखिक एवं मानसिक स्तर पर सफाई, व्यवस्था एवं
स्वच्छता बनाए रखें।
नियम -
1) ह्री - अनुताप या पश्चात्ताप। विनम्र रहना एवं अपने
द्वारा की गई भूल एवं अनुपयुक्त व्यवहार के प्रति असहमति एवं शर्म
ज़ाहिर करना। यह ज़रूरी है कि हम इतनी विनम्रता रखें कि दूसरों के
सामने अपनी भूलों की क्षमा याचना कर सकें। हमें समय को हाथ से नहीं
जाने देना चाहिए, स्वयं के विकास एवं उत्थान के लिए पुरुषार्थ करना
चाहिए।
2) संतोष - प्रभु ने हमारे निमित्त जितना भी दिया है,
उसमें संतोष रखना, जो भी है और जितना भी है, उसे स्वीकार करने का भाव
रखना जो अप्रत्यक्ष रूप से जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव है।
कृतज्ञता से जीवन जीना ही संतोष की परिभाषा है, न कि नकारात्मक भाव से
किसी के द्वारा शोषित होना। अपने हाथों में जो भी है, उसका सदुपयोग
करना। जो अपने पास नहीं है, उसके लिए अकारण ही शोक व्यक्त करने में
कोई सार नहीं है।
3) दान - हम अपने प्रयासों को अपना न मानकर ईश्वर की देन
मानें। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि किसी भी व्यक्ति को बिना सोचे
समझे दान करें। सिगरेट पीने वालों को सिगरेट, मांस खाने वालों को
मांस, शराबियों को शराब एवं नशे में धुत लोगों को नशीले पदार्थ न दें।
ऐसे व्यक्ति को धन न दें जो उस धन को शराब पर खर्च करेगा। हमें अपने
परिश्रम के फल के एक हिस्से को धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्थाओं में
दान करना चाहिए। मानवता को असल में आध्यात्मिक ज्ञान की ज़रूरत है
क्योंकि ईश्वर से मानवता का अलगाव हमारी सभी समस्याओं का मूल कारण
है।
4) आस्तिकता - स्वयं में, अपने आध्यात्मिक मार्ग में,
धर्म में एवं प्रकटित वेद में, हमारे गुरु महाराज एवं ईश्वर में
निष्ठा एवं विश्वास रखना। वेदों के शब्द एवं हमारे पूर्व आचार्य एवं
वर्तमान के आध्यात्मिक गुरु पर श्रद्धा रखना।
5) ईश्वर पूजन - किसी भी तरह से अपने घर में देव पूजा के
लिए एक अलग कक्ष नियत करें। इष्ट देवता की वेदी बनाएं एवं अपने गुरु
के चित्रों को रखने की व्यवस्था करें, अगरबत्ती जलाएं, उस जगह को साफ
एवं ढंग से रखें। आध्यात्मिक गुरु एवं ज्ञानी संतों द्वारा दिए गए
सुझाव एवं मार्गदर्शन के अनुसार रोज़ पूजा करें। यह बहुत ज़रूरी है कि
एक गृहस्थ होने के नाते हम ज़्यादा से ज़्यादा घरों में प्रभुभक्ति और
आध्यात्मिकता का प्रकाश फैलाएं।
6) सिद्धांत श्रवण - प्रकटित वेदों के व्याख्यानों एवं
सम्मेलनों का श्रवण करना। हमें एक ज्ञानी या प्रामाणिक आध्यात्मिक
गुरु की खोज करके उनकी वैदिक कक्षाओं में नियमित रूप से उपस्थित होकर
उनके आदेश पर चलना चाहिए। मन एवं बुद्धि को पवित्र करने के लिए
साधु-संतों एवं ज्ञानीजनों की संगत में वेदों का अध्ययन एक शक्तिशाली
माध्यम है।
7) मति - एक प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन से पुरुषार्थ
करके अपनी इच्छा शक्ति एवं बुद्धि को आध्यात्मिक बनाना, हमारे धर्म
गुरुओं द्वारा सिखाई गई नित्य साधना का पालन करना।
8) व्रत - धार्मिक व्रत, हमें अपने धर्म, गुरु एवं ईश्वर
के प्रति लिए गए धार्मिक व्रतों के प्रति एवं निष्ठावान रहना चाहिए।
मांस एवं नशीली पदार्थों का सेवन नहीं करना, अवैध यौन संबंध, जुए आदि
से बचकर रहना - ये सामान्य व्रत भी ज़रूरी हैं एवं गंभीरता से पालन
करने योग्य हैं, ये एक आध्यात्मिक प्रतिबद्धता है जिन्हें हम अपनी
परंपरा या गुरुओं की वंशावली से चुनते हैं। यह बहुत ज़रूरी है कि हम
विवाह, एक धार्मिक परंपरा के प्रति निष्ठा, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य
जैसे व्रतों का सख्त पालन करें। हमारे गुरु द्वारा बताए गए आध्यात्मिक
प्रयास एवं साधना के रास्ते पर अटल रहें।
9) जप - मंत्रोच्चारण करना। इसे मन का झाडू माना जाता
है। जैसे हम रोज़ स्नान करके अपने आपको स्वच्छ रखते हैं, उसी तरह
प्रभु का नाम हमारे तुच्छ एवं नकारात्मक विचारों की सफाई करता है। अतः
जप
आध्यात्मिक स्वच्छता का एक साधन है। यह दिव्य एवं
परात्पर सत्य के साथ संबंध स्थापित करने का बड़ा महत्वपूर्ण साधन
है।
10) तप - इसका मतलब है कि जीवन में कैसी भी दुष्कर
परिस्थिति हमारे सामने प्रस्तुत हो, उसका अनुशासन एवं परिपक्वता से
सामना करें। उत्साह एवं प्रसन्नता से व्रत रखना, पूजा करना, पवित्र
स्थलों की यात्रा करना। विलासप्रियता एवं फिजूलखर्ची न चाहकर सादगी से
जीवन जीना। इंद्रियों के संतोष के लिए अपने आप को अंधाधुंध समर्पित न
करना।