पंच श्रद्धा

यदि अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा में इन पांच सिद्धांतों को महत्व दें, तो यह माना जाएगा कि बच्चों को हिंदुत्व की व्यापक परिधि में शिक्षित करके उन्होंने अपने आध्यात्मिक कर्तव्य का अनुपालन किया है।

1) सर्व ब्रह्म - बच्चों को यह मूल तत्त्व सिखाया जाए कि ईश्वर एक है, सत्य भी एक है जो अंतर्निहित है और परात्पर भी, एक अप्रकट सत्य, सभी का सृष्टा, रक्षक एवं संहारक है। शिव, राम, कृष्ण आदि जैसे अलग-अलग रूप और कुछ नहीं, सिर्फ उस ईश्वर या सर्वव्याप्त, सर्वशक्तिमान, चेतन सत्य के अलग-अलग पहलू हैं। उन्हें यह सिखाना चाहिए कि किसी भी प्रकार की आराधना के प्रति सहिष्णुता एवं आदर का भाव रखें क्योंकि एक ही परमात्मा है जिसकी अलग-अलग रूपों एवं अलग-अलग नामों से पूजा की जाती है।

2) मंदिर - यह अत्यंत आवश्यक है कि बच्चों को मंदिर के दर्शन का महत्व सिखाया जाए ताकि वे हमारे उत्सवों एवं संस्कारों में अंतर्निहित आध्यात्मिक भावों को अपना सकें।

3) कर्म - बच्चों को इस तरह से शिक्षा देनी चाहिए ताकि वे समझ सकें कि दिव्य कार्य-कारण के नियम में दिव्य न्यायशीलता विद्यमान है, यानी कि मन, वचन और कर्म की प्रत्येक क्रिया एक समानांतर रूप की प्रतिक्रिया से जुड़ी हुई है। यह शिक्षा जीवन की राह में करुणामय चरित्र एवं उत्तरदायित्व के निर्माण में योगदान देती है।

4) मोक्ष - यह ज़रूरी है कि बच्चों के साथ यह चर्चा की जाए कि जीवन में आवश्यक क्या है, किस तरह जन्म-मरण के अनंत चक्रों के बाद, जहां हम कर्मों के फलों को भोगते और भुगतते हैं, हर आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर मुक्ति प्राप्त करेगी।

5) वेद, गुरु - यह ज़रूरी है कि वेदों के प्रति उनके मन में आदर एवं श्रद्धा का भाव स्थापित किया जाए, पवित्र प्रकटित वेद उनके जीवन के सहभागी रहें और वे उनमें पाए गए सिद्धांतों की मर्यादा को समझें एवं उनका पालन करें। हमें प्रत्येक बच्चे के मन में इस बात पर ज़ोर देना चाहिए कि वे अपने गुरु का अंतर्मन से आदर करें क्योंकि गुरु के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के बगैर आध्यात्मिक जीवन का विकास एवं उत्कर्ष असंभव है।